शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७६२ — कहें परिवर्तन स्वीकार हैं -- पथिक अनजाना

सीख मिली यहाँ के लिये मुझे इक अनमोल हैं
वर्तमान युग में कहलाते यही वे सच्चे बोल हैं
अपनी मेहनत कुछ कमाई को  तुम ऐसे बांटो
स्वास्थय,खाद्य,वस्त्र आवास कोक्रमिक क्रम
समाज के बाद आवे संतान सुख व शिक्षा हैं
उनकी उच्च शिक्षा स्थायित्व की सोच त्यागें
उच्च शिक्षा दूर ले जाती आ बहूआ गैर बनाती
इंसा तुम रहो इंसा, न बनो कभी तुम व्यापारी
संतान हेतू न पालो धन की जानलेवा बीमारी
इनकी हेतू किया समर्पण,देखेगें न आप दर्पण
विश्वास न करें किसी पर न जा स्वप्न सजायें
सही कहा गया पूत कपूत तो क्यों धन संचय
अक्षरक्ष: सत्य पूत सपूत तो क्यों धन संचय
किस्मत गर उनकी, देखिये राह वे खुद बनायें
किनके लिये गुनाह करते, न यह भागीदार हैं
समय साथ बदले व्यवहार, नियम व विचार हैं
क्यों बंधें आप, क्यों न कहें परिवर्तन स्वीकार हैं
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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