सोमवार, 8 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६७८ --- स्वदोष छिपा पूर्वजों ने -पथिक अनजाना

विगत दिनों मेरे बहुत करीबी मित्र ने प्रकाशित की हैं
दृश्यवान घटनाऔ पर हैं सुरचित कविता खूनी धरती
मैं लगा सोचने  मां धरती का ऐसा स्वभाव क्यों हुआ
मित्र ने सामाजिक हालात इंसानी विचारों को न छुआ
कही भूल मित्र माँ को न अपमानित करो न दो बद्दआ
मुझे मूल में समाज रचना नीति गाथायें दोषी लगतीहैं
काव्यों गाथाऔ मे खूनी मानसिकता सम्मानीत मानी
साथ पाठ शांति आपसी सदभाव साहिल रूप पहचानीहैं
दो साहिलों के बीच फंसी इंसानी संतानें सदैव बौरातीहैं
पूर्वजों की इस सौगात ने इंसा रूलाया इतिहास दुहराया
साहित्य ऐसा दफनाओ यारों बढें हमने शांति को चुनाहैं
धरती न खूनी, स्वदोष छिपा पूर्वजों ने विवादों को बुना

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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