शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक – ७५१ -- मेरे भारत को बचा लो--- पथिक अनजाना

अब उपजे विदेशी संक्रमणों से मानव व पशुओं का
चारों ओर फूलता-- फलता यहाँ संसार भी  देखा हैं
भारतीय जनता व मान्य विश्व गुरू  भारत में मैंने
जयचन्दों के रक्तबीजों को यहाँअब पनपते देखा हैं
व्यापारियों व्दारा सुदूर ग्रामों से कबाड बर्तन लाकर
नगरों में ऐतिहासिक बताके क्रयविक्रय होते देखा हैं
मैंने तथाकथित धार्मिक लुटेरों के अभेद सरंक्षण में.
घोटालों में लिप्त राजनेताओं का भव्य बसेरा देखाहैं
कहीं गौमूत्र गोबर से सफल उपचार होते भी देखा हैं
कुण्डियों में उगे ज्वारों,वनस्पति सत्त का फल देखा
१९५० पूर्व  के विशुद्ध रागों का चमत्कार भी सुना.हैं
भारतीयता बचानीतो हर गांव में गौशाला लानी होगी
अधिक फसल लालच त्याग धाक शुद्धता की जमानी
वासियों में भारतीय-मानस बना भारतको गुरू बनाना हैं
खोजूं भारत को भारत में ,यारों मेरे भारत को बचाना हैं
पथिक अनजाना
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी ( पथिक अनजाना )




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें