देख
रहा यहाँ चारों ओर मै कितने अजीबोगरीब हालात हैं
खोई
इंसानियत स्वघोषित बुद्धिमान पर मूर्ख इंसान की हैं
पूजते
खुदा को पर बुद्धि निर्मित व सुचारू हैवानियत की है
मूरत
पूजे ग्रन्थ पूजे खुद को छिपाते बनाये पहनावों मे हैं
गले
मे माला बुद्धि पर ताला खिदमतगार बन गये लाला हैं
ग्राहक
अपने बनाये फंसाये रखने का नियम बना निरालाहैं
धर्म
को दफना आडम्बरी धार्मिक कहाने हेतू चोला डाला हैं
चोलाधारी
धार्मिक कहलाते जिनका धर्मिकता से न नाता हैं
पूछता
क्या धार्मिकता की गिनती धारक
संख्या से होती है
ऐसे
धार्मिक जहाँ एकत्रित हो वह खुदा का घर नही होता हैं
सत्य
कहा रजनीश ने वहाँ कणकण
में अधर्म निश्चिंत सोता
जहाँ
से सुभाषी,सुविचारी सुकर्मी अनजाना राही निकल जावे
वह
अनजानी राह अनजाना पथिक सत्य में धार्मिक कहलावे
धार्मिक
व्यक्ति न परिचय दे, न किसी को समूह में बांधता
ध्यान
देना अंगीकार करना पर नाम भूलना तुम राही का हैं
याद
रखा तुमने तो, इक नई दुकान पहनावा झंडा सजा लोगे
तथाकथित
धार्मिक आत्मा रोवेगी कैसे प्रशंसक कहलावोगे ?
पहनावा
धार्मिकता नही हैं, बनावोगे तो शांत न रह
पावोगे
पथिक
अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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