माना
कि बाती जलाके कमरे में वैचारिक नग्न होते हैं
माना
कि साक्षी बाती बनती चाहे हम माने या न माने
जमाना
क्या
जाने
वो जलते
बल्ब के
दर्द
को
क्या
पहचाने
चाहा
बनकर बाती राह हम सारी दुनिया को दिखायेंगे
लोग
न समझे कि पल पल मरने का दर्द क्या होता हैँ
सांसों
का साथी जलाता करबदनाम अस्तित्व मिटाता है
करते
करीबी आ कटाक्ष: जब हम रचना रच रहे होते हैं
हीरे
की कीमत जौहरी जाने सामान्य काँच मान खोते है
हम
दुनिया देख हंसते दुनिया वाले हमें देख क्यों रोते हैं
ब्लाग
-- सूनी
राह का पथिक
--- पथिक
अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
यदि
अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें
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