शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७५२ -- वैचारिक नग्न होते हैं -- पथिक अनजाना

माना कि बाती जलाके कमरे में वैचारिक नग्न होते हैं
माना कि साक्षी बाती बनती चाहे हम माने या न माने
जमाना क्या जाने वो  जलते बल्ब के दर्द को क्या पहचाने
चाहा बनकर बाती राह हम सारी दुनिया को दिखायेंगे
लोग न समझे कि पल पल मरने का दर्द क्या होता हैँ
सांसों का साथी जलाता करबदनाम अस्तित्व मिटाता है
करते करीबी आ कटाक्ष: जब हम रचना रच रहे होते हैं
हीरे की कीमत जौहरी जाने सामान्य काँच मान खोते है
हम दुनिया देख हंसते दुनिया वाले हमें देख क्यों रोते हैं
ब्लाग --  सूनी  राह का पथिक
--- पथिक अनजाना  (सतनाम सिंह साहनी)

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