शनिवार, 7 नवंबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७६३ --- दुनिया में सम्हाल होश -- पथिक अनजाना

दुनिया मे सम्हाल होश जंवानों की भांति सोचा
चाहा बहुत कुछ करेगें हम न पीछे कभी हटेंगे
जीवन- कारवां चलता रहा मैं हाथ मलता रहा
जाने कब वक्त कैसे हाथों से निकलता ही रहा
अब साहिल से टकराने का साहस  छोड दिया
वक्तियाँ मौजों पर, उम्र जीने की आस रह गई
उम्मीदों व आशाओं को मैंने दफन कर दिया हैं
इंतजारे आखरी सांस में अब मेरी सांसें रह गई
लम्हे इंतजार के बिताने हेतू विचार कह जातेहैं
काबिले तारीफ सब्र आपका , पढ मुकर जाते हैं
विचार अपने ब्लागों में हम लिखते नही थकते
मुहब्बत आपकी देख मेरा नाम वही जा अटकते
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक

पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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