शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ७६१ -- बेहतर यही होगा -- पथिकअनजाना

जितने भी आते ख्यालात , हकीकत हमें जहाँ में नजर आती हैं           
चाहे यह नातों रिश्तों प्यार मुहब्बत के हो या आशाऔं के पहाड
सपने या लालसायें मोह या कडवाहट जो आते नजर में हैं बाजार
होगा कोई सरल तरल कोई फंसा धागा गुन्जलें संसारिक भरमार
मारे परिचित सब टूटे हुये धागे, छोटा लम्बा कही गँठानें भार हैं
जिन्हें लपेट हम दिलोदिमाग की चर्खी पर गुजारते यह जिन्दगीहैं
सुलझाने में जिन्दगी गुजरती कि मैंने लिये कुछ नये टुकडे लपेट 
गर गैरत तुझे जरा तो जान ले यह चर्खी तेरा शरीर रूपी मकान हैं
आत्मा किरायेदार दिन आवे जब मकां स्वच्छ कर वापिस जावेगा
सुकर्मों रूपी राशि कमा यहाँ किराया जो सदा देता प्रकृति को यार
व्यर्थ कर अपना वक्त उम्र का धागे जोडने तोडने पिरोने में
न गँवा जिन्दगी इन ऊलझे हुये गाँठों में फंसे धागे  सुलझाने में
बेहतर यही होगा दूरियाँ बढा मूक दर्शक बन कर रह जा मेरे यार

सतनाम सिंह साहनी (पथिक अनजाना)

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