गुरुवार, 2 जुलाई 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७४८ -- बिखर नही सकता है --- पथिक अनजाना

मुहब्बत का अंत न हास्य न करूणा न तमाशा कही यारों
की मुहब्बत हर इंसान ने पर अंत मुहब्बत का न है हुआ
बिछुडता कोई अपनी मुहब्बत से पर बिखर नही सकताहै
चूंकिमुहब्बत करने वाला जाते हुये कहता परीक्षा शुरू हुई
परीक्षार्थी बन जीता इंसा पर जिन्दगी में होता जोश नहीहैं
मुहब्बत में मदहोश पर जीवन में देता किसी को दोष नही
सच्ची मुहब्बत करने वाले इर्ष्या नही करते होता रोष नही
जिन्दगी वक्त बीताते वे वक्त के दरिया में लहरों के साथ
समाज ,जग में दिखते साथ शामिल रहे उनकी सोच कही
सो जाना मुमकिन हैं मुहब्बत का परअंत नही हो सकता हैं
ब्लाग  --  सूनी राह का पथिक

पथिक अनजाना

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें