गुरुवार, 20 अगस्त 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७५४ ---- सूने राह का पथिक ----- पथिक अनजाना

सूने राह का पथिक बन कर यारों हम
सूने दिल में खुद को समेटे यूँ ही
सूने आसमान के तले चल ही पडे
हम थे कि दुनिया को खोज रहे थे
कीमत लगी मेरी मेरे जाने के बाद
सोच देख खोज कर इतिहास हमारा
क्यों रहनुमां दुनिया के  खोजते रहे
हमने मुडके न देखा कभी किसी को
दुनिया वाले मुड हम पर सोचते रहे
गम न हो कभी जाने का हमें अपने
जिन्दगीहै सपना तो कौन पाले सपने
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
ब्लाग सूनी राह का पथिक http://jasmeh.blogspot.com

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