खोजता
था मैं तुझे, दर नही तुम क्यों खोल रहे थे
हो
मायूस दीवाले छत देख खुद को क्यों रोक रहेथे
खुद
हो तन्हा व दीप बुझाना न दु:खों से भागना हैं
रे
इंसा किस्मत में भागना नही
दुखों में जागना हैं
लाख
चेताया पर समझ तुम्हारी नही कभी आया हैं
क्यों
आशादीप जलाये, बैगाने बन हम यहाँ आये थे
निराशा
के जाल से निकलो जो बीता गुजरे साये थे
आशा
हेतू तुमने कही गैरों के दीप बुझा तो न दिये
निराशा
हेतू यार कही अपने कफन सजा तो न दिये
मस्त
रहो तुम,मस्ती के ताजमहल बना तो न दिये
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग
– सूनी राह का पथिक
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