रविवार, 20 सितंबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ७५८ -- उनसे क्या कहते हो --- पथिक अनजाना

दस्तक हमारी तुम्हें कभी भी बाहर बुला सकी              
न आवाज कानों मेंहमारे कभी तुम्हारी आ सकी
दरवाजे के उस पार तुम इंतजार करते रह गये
इस पार खडे  वक्त  हम यूँव्यर्थ करते रह गये
दुनिया में भेज कर खुदा तुमने यह क्या हैं रचा
फंसाया माया –जाल में मिली कौन सी हैं सजा
दुनियायी लोग दुनिया में खुदा को खोजते रहते
कहू न खोजो खुदा को,खुदा की राह तो खोजिये
राह सुकर्मों की हैं फिर क्यों व्यर्थ प्रपंच सोचिये
जिन्हें बिठा सिर राह खुदा की तुम पूछते रहते
वे तो स्वंय भटके हुये तुम उनसे क्या कहते हो
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग सूनी राह का पथिक


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