रविवार, 13 सितंबर 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक ७५७ -- सोचे कुछ परिणाम कुछ --- पथिक अनजाना

अचम्भा देख देख यहाँ सारा जीवन दिया हैं गुजार
अचम्भों से परिपूर्ण ज्ञात ब्रम्हाण्ड पंख अपने पसार
जीवों,जलचरों,पक्षियों की बनावट में मुग्ध ये संसार
आवाजें सबकी लुभावनी हाले दिल पर छायी विचार
पर सबमें अचम्भित करे मुझे यह इंसानी व्यवहार
विचारे कुछ कर कुछ सोचे कुछ परिणाम कुछ होता
देखता –दिखाता खाता-खिलाता कहता सुनाता जो हैं
कहते सोचो सकारात्मक तो शांति वैभव सुख पावोगे
घटनाओं से प्रभावित को कैसे सकार-सागर में लावोगे
न पा सका पथिक न देव कोई छोर राह जोअपनावोगे
ज्ञान का भंडार इंसा किन्तु स्वार्थ –लोभ से रहे बीमार
दर्शाता लुभावने विचार किन्तु चढा आडम्बरी बुखार
पथिक अनजाना खा गया धोखा  पर्दे जो बेशुमार हैं
थक गया देख देख सो मौन धारण का किया विचार
हारे ज्ञानी अनजानी रही सदैव की कहानी से नाता हैं
देवताओं का शोध –विषय किन्तु देव दुकानें पा जाते हैं
वर्तमान शोध छोड विवश नया शोध विषय सजाते हैं

सतनाम सिंह साहनी ( पथिक अनजाना)

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