गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक - ७२७ -- खुद ठौंकी कील-- पथिक अनजाना

खोये थे आस व मोहक सपनों में  हम        
इक आस बेहद प्यार लुटाने की चाह 
हसीनाऔं के छल कपट में फंसकर के
हमारी कहानी खुद इक सवाल हो गई
सामने किस्मत से खूबसूरत राह मिली
हमारी जिन्दगी में कुछ बनने की चाह 
खुद ठौंकी कील ताबूत भाग्य पर मैंने
यूँ भटके यहाँ कि जिन्दगी आह हो गई
सतनाम सिंह साहनी


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