कहते योनि मनुष्य को पाने हेतू जन्म अनेकों
पल पल सुराह चलकर याचना में गंवाने होते हैं
कहते योनि मनुष्य से सकुशल निकलजाने हेतू
पग पग संभलके सुविचार सदैव अपनाने होते हैं
भयभीत हो इस जन्म को जाप में खोने आये हैं
जन्म जीने को या बेसुध जाप में होने को आये हैं
जन्म अनेकों गंवा न अब वैराग्य-वीणा चाहता हू
न सोच भविष्य की सुराह पर मैं जीना चाहता हू
मस्त बेफिक्र लूं सांसें जहाँ वह मैं गढी चाहता हू
मस्त बेफिक्र सुराह दिखावे वही मणि चाहता हू
ब्लाग - सूनी राह
का पथिक
पथिक अनजाना
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