नही सोचा कभी किसी के कदमों के निशां पर चलें
न सोचा कभी किसी को पूजें न पीछे आंख मूंद चलें
नही सोचा कभी वैभव ऐश्वर्य की गोद में सांसें चलें
न नजरें ऊंची कर जमाने का नमस्कार स्वीकार करें
नही सोचा बन विदूषक कभी हास्य का केन्द्र हम बनें
सोचने को था ही नही कुछ, जमी पर कदम चलते गये
न देखी राह जानी मानी या विश्वासनीय कहानी की हैं
निशां कदमों के बनते खुदबखुद शायद मिटते चले गये
न कभी रखी किसी आने की आस न दूरियों पर उदास
वक्त को बहता पानी मान लहरों पर हाथ मचलते रहे
--- आप बतायें राह
अपनी बनाना निशां अपने छोड
जाना नश्वर देहत्याग के बाद भी इंसा को जीवित रखने
हेतू सस्ता सौदा
नही हैं ? आप क्या अपनाना चाहेंगें?
प्रतीक्षारत मेल
पर---
ब्लाग – सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (पथिक अनजाना )
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