रंग न हो तो सुन्दरता को कैसे कौन कब पहचानता
अंग न हो गर तो जीवों की होती क्या रूप मान्यता
व्यंग्य न हो सत्यता प्रकट हो जावे यह कौन ठानता
ढंग न हो गर यहाँ मधुरता को कौन सदा पहचानता
कवि न तो कोमलता हेतू शब्दखाक ले कौन छानता
रवि न होते तो प्रकृति सौन्दर्य को कौन हैं बखानता
छविकार न तो अतीत
को कौन भविष्य में जानता
नही कुछ जान सका बस इतना ही यहाँ जानता हूं
पथिक हू राह हेतू आशियाने की चौखट लांघता हू
चाह मेरी आप हमसफर बने यही आपसे मांगता हू
------- तो मेरे दोस्तों जिन्दगी , दुनिया की मोहरे चलते
पीटते देते शह व मात खाते रहेंगें क्यों न व्यस्तता में कुछ
पल रंगों की दुनिया
में खो जावे ,सारे अरमान व तूफान
सो जावे हम हो स्वतंत्र
सभी सीमाओं से दूर हो जावे
क्या आप मेरे साथ देगें ?
ब्लाग -- सूनी राह
का पथिक
पथिक अनजाना
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