भावी संभावित
प्रदर्शनयोग्य नाटय-शाला के अनुभव
तथाकथित नाटय पूर्व
मंचन मंच पर जहाँ होता था
न जाने किस रूप, आधार,किस विचार से जाने लगा
दर्शक हूं अंकेक्षक नही क्यों कलाकार को टोकने लगा
दिग्दर्शक हो प्रभावित पास मुझे वो अपने बैठाने लगा
मंच पर आता गुजरता कलाकार अब डगमगाने लगा
प्रदत्त संवाद व शैली
में वाक्य हरकतें मिलाने लगा
दिग्दर्शक व मुझे कारण परिवर्तन का समझ न आया
सोचते सोचते मैं अपने बैठने के स्थान पर जाने लगा
हालात बदले अब में मंच पर बारंबार गिर जाने लगा
हाल अपने से परेशान पूछा जब मैंने उस कलाकार से
दिया उत्तर पहले गिरता मैं था क्यों गिरते अब आप
हल मेरे गिरने का मुझे मनोस्थिति आपकी ने बताया
मंच पर संभल जाता बदले ध्यान से आप गिर जाते हैं
गैरों की सोच में खोकर क्यों दलदल में आप समाते हैं
कर इन्द्रियों पर नियंत्रण सफल कलाकार हो जाते हैं
उठ गणेश-व्दार से लहर हो आज्ञाचक्र से दशम पर जाती
शीश मध्य किनारे त्रिकोण श्रृंखला तीन ओर झिलमिलाती
आत्म –ज्योति खुले आसमां में मुक्त भारों से घूम आती
ध्यान खोया मैंने कभी अब आप ध्यान क्यों खो जाते हैं
ब्लाग --
सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (
पथिक अनजाना )
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