शायद वे सब हंसते मेरे पीछे पढकर ख्यालात मेरे हैं
शायद वे कही मस्त नही समझते हैं सवालात मेरे हैं
शायद सुनते पढते पलटते हो मजबूर बयानात मेरे हैं
शायद की दुनिया में शायर को शह देने वाले रहते हैं
न जानो लेखक व शायर को कायर आईना दिखाते हैं
शब्द माला पिरोते इंसानी मानसिक तह तक जाते हें
न फिक्र इनको तुम्हारी न किसी बंधन में बंध पाते हें
दुनिया वालों की नजरें दुनियायी वनों में खो जाती हें
इनकी नजरें तह तुम्हारी से जा गगन को समाती हैं
नजरें इनकी पवित्र नजरें तुम्हारी अपवित्र हो जाती हें
फर्क मौजूद मध्य तभी लेखनी
पठनीय हो ही जाती हैं
ब्लाग --
सूनी राह का पथिक
http://jasmehblogspot.com
सतनाम सिंह साहनी (
पथिक अनजाना )
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