मंगलवार, 31 मार्च 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक - ७३८ -- प्रतिनिधि ही काफी हें - पथिकअनजाना


युग वर्तमान में पुरूष संतानें माता –पिता से क्यों नाराज
चूंकि जन्मदाता हक से रहते हैं पास व हक से मांगते हैं
ससुराल पक्ष से तथाकथित पुरूष संतानें क्यों प्रसन्न रहे
चूंकि हक जताने की जरूरत नही प्रतिनिधि ही काफी हें
देख पत्नी का त्रिया-चरित्र खुद ही पुरूष ससुराल को देंगें
जाहिर न करेंगें क्या भेजा गुप्त वर्ना जनक भेजा खायेंगें
दोषी वधुयें नही क्यों पुत्र त्रिया-चरित्र के सामने समर्पित
जानते करोडपति ससुराल पर उन्हें मासूम, गरीब कहते हैं
यही इस सदी का तोहफा यही अनेको परिवारों का नसीब
जन्मदाता को देना न भाया पत्नी की मुस्कानों में समाया
होत बिरले सुपुत्र,रहिये ज्यों पुत्र-वधु रखा पुत्र न हो सखा
बुजर्ग गोष्ठी मध्य हवा में आहपूर्ण आवाजों ने हमेंबताया
पथिक अनजाने ने देखा दर्द चेहरों पर कहा वाह या खुदाया
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)


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