बुधवार, 11 मार्च 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ७३५ -- सजाने की बात समझ न आई – सतनाम सिंह साहनी


दूर से देख़ कर हर राह बंद गली ये जिन्दगी  रास आई
ह न सोचा कि मोड हो सकता इसकी तो आस न आई
थक चुके पहले से थे किसी ने हमें राह कभी नही बताई
टूटे पहले थे सपने हमारे सजाने की बात समझ न आई
लोगों के चेहरों, विचारों, क्रियाओ में नही मति बूझ पाई
न विचारा संवारा आज न चेतावनी बुजर्गों की हमें भाई
राह जिधर मिली बचाते खुद को चलते ही हम यहाँ गये
न किसी को हम न कोई हमें अपना सका पथिक ही रहे
ब्लाग सूनी राह का पथिक
सतनाम सिंह साहनी ( पथिक अनजाना)
http://jasmehblogspot.com


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