दूर
से
देख़
कर
हर राह बंद
गली ये जिन्दगी रास न आई
यह न सोचा कि मोड हो सकता
इसकी तो आस
न आई
थक
चुके पहले से थे किसी ने हमें राह कभी नही बताई
टूटे पहले थे सपने
हमारे सजाने की बात समझ
न आई
लोगों
के चेहरों, विचारों, क्रियाओ में नही मति बूझ पाई
न
विचारा संवारा आज न चेतावनी बुजर्गों की हमें भाई
राह
जिधर मिली बचाते खुद को चलते ही हम यहाँ गये
न
किसी को हम न कोई हमें अपना सका पथिक ही रहे
ब्लाग
सूनी राह का पथिक
सतनाम
सिंह साहनी ( पथिक अनजाना)
http://jasmehblogspot.com
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