बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक - ७३३ -- राह पर जाने की सोचते रहे -- पथिक अनजाना

खुदा खुदा को खोजते   ताउम्र राह पर जाने की सोचते रहे
रही खुदा की  सदा प्यास बाकी पावें राह खुदाई आस बाकी
ग्रंथों में दियाज्ञान समझे नही ग्रंथ हम ढोंगियों के पढ गये
राह खुदा की खोज न सके नतमस्तक दुकानों पर हो गये
होश आया जब बेनकाब दुकानें हुई व्यर्थ सांसें खोजते रहे
सतनाम सिंह साहनी ( पथिक अनजाना )
ब्लाग --  सूनी राह का पथिक

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