गुरुवार, 29 जनवरी 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक -७२५ -- गर वो दुश्मन तो ---- सतनाम सिंह साहनी

समझ नही पाते किसका कहाँ                                 
मुकाम कब क्यों मुकर्रर करैं हम
गर हैं वो दोस्त तो कभी मुश्किलात
हमारे सामने आने न देंगें
गर वो दुश्मन तो हम खुद को
कभी मुश्किलात में जाने न देंगें
हैरानी तो यह हैं कि बनते
परेशानियों के सबब कहलाते खैरख्वाह
बचना चाहे गर परेशानियों से हम
तो हो जावें प्यारे हमसे खफा
कोई गैर बतावे  कौन दोस्त कौन
दुश्मन कौन कब क्या होते हैं
कब हमराही बनेंगें कब राह हमारी
में वो दिल से रोडे अटकावेंगें
कब गर्म हवाओं से पहलू मे छिपा
बचावेंगें कब दे धोखा झुलसावेंगें
खुदा ने भी इन नैनों में बडे रहस्यमयी
करिश्मे सजा भेजे जहाँ में
मासूमियत प्यार का सागर जाने क्या
कौन से रहस्य छिपे गागर में
पथिक अनजाना



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