अब हम नाम खो
गये---पथिक अनजाना
मैं मूर्ख भेद ओम व
एक ओमकार में समझ न पाया
देखता भेद किसी ने पीछे किसी ने आगे को हैं घुमाया
किसी ने मुझे समझाया ओम का संशोधित रूप हैं आया
ग्रन्थ सभी कहते आत्मा जो सूक्ष्म रूप हमारा अमर हैं
विश्वास संजीवनी जीवन की तभी जीवन मूल्यवान हें
चुप्पी हर कदम पर इंसा की संसारिक आयु की सांस हैं
माना औषध ज्ञान खान पान शारीरिक नियंत्रित करता
प्रकृति पर यकी इंसानी हर सांस में खुश्बू मस्ती भरता
सप्ताह में किसी एक वक्त निराहर शारीरिक औषध हैं
हर सांस में प्रकृति पर यकीं के साथ जीना दुख-वध हैं
ये अनुभूति तब जानी जब रूप आत्मा का मैने पहचाना
इस संसार के राग
विराग अनुराग स्वांग व्यर्थ हो गये
जब मरे थे कहाते जीवित इंसा अब हम नाम खो गये
पथिक अनजाना (सतनाम
सिंह साहनी )
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