मंगलवार, 6 जनवरी 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक - ७०६ - मैं प्राकृतिक सुरों में नहाया---पथिक अनजाना



मैं प्राकृतिक सुरों में नहाया---पथिक अनजाना

जिन्दगी में नासूर इतने दिये व दे रहे मुझे मेरे अपने हैं
रख मद्धेनजर मजबूरियाँ चीख न सके माना मौज पा गये
भूलकर दर्द छाती गर्व से फुला खुद में ही जा हम समा गये
मिली मौजों को ऐतिहासिक उम्मीदों की कब्र में दफना गये
अब छोड कब्रिस्तान पीछे दिया मैने राह अनजानी को पाया
न गन्दगी उछालें गुजरी राहों की मैं प्राकृतिक सुरों में नहाया
मस्त मतवारों की दुनिया में आ पथिक अनजाना कहलाया

पथिक अनजाना  (सतनाम सिंह साहनी )

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