औलाद के दो हाथ मिलकर
दिलरूबा के हाथों में ऐसे
होंगें
हम
भ्रमित ख्याली पुलाव में थे
हमारी
ढली उम्र में झटके हाथ
हंसे
खूब खूबसूरत सपने जो थे
रोये
जागते हुये क्यों सपने देखे
हंसे
क्यों याद सपनों की करते
रहगुजर
हंसे हम हंसते रोते क्यों
न
जाना सोना जागना होता क्या
हर
सांस मर रही मेरी खोया क्या
जिये
न सांस में किया स्वप्न-ब्याह
वे
खोये ख्यालों हम हो गये तबाह
सांसें
बची नही बर्बादी के बने गवाह
पथिक
अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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