रविवार, 4 जनवरी 2015

अभिव्यक्ति क्रमांक - ७०४-- बस्तियाँ व नगर आबाद हैं ---- पथिक अनजाना



  समझे  हम  ताउम्र इस  दुनिया  में  क्या रखा  हैँ   
हैं कौन सी कशिश जो लोग व देवता चले आते हैँ
घिरी रेखाऔ में अग्निपिण्ड सूर्य तले बसी दुनिया
आग का घेरा आग का डेरा किरणों से आता सबेरा
होता मुझे एहसास हैं पास कहीं छिपा कुछ खास हैं
तलाश पाया बेवजह ठाहकों में चले इंसानी सांस हैं
झूठी मुस्कानों की लहरों पर पहना कैसा लिबास हैं
हकीकत से दूर इंसानी बस्तियाँ व नगर आबाद हैं

---पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी )

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