बाद मरने के मेरे कलमों के निशानों का हश्र क्या होगा
छिपे छिपे उदगार
छपने लगे हम बेनकाब होने लगे
सामना जमाने का
हौसला हम जीते जी कर न सके
बाद मरने के ऊदगारों
की इज्जत लोग खाक करेंगें
अजीब राह उदगार
अभिव्यक्तिकर्ता इन बाँवरों की हैं
न धन न वाह
अपितु पुस्तक छपाने हेतू धन देते है
मुंगेरी स्वप्न
दुनिया के शौकिन पाठकगण हंसलेते हैं
निराशावादी
दिखाते जो हकीकत दुनिया जमी की हैं
सच्चाई से आंख
मूंदने वाले इंसा मूंद आंखें लेते हैं
जाने किस कशिश
में परवाने वक्त बीता मिट जाते
याद न करते
इन्हें जली लंका को लोग याद करते है
राहें किसी और
को दिखती कवि गुमनाम हो जाते हैं
ब्लाग -- सूनी राह का पथिक
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सतनाम सिंह
साहनी (पथिक अनजाना)
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