बहुत पहले लिखा था मैंने कभी इंसान में कितने खुदा हैं
हर इंसानी चेहरे के पीछे अनेक पर सामने एक खुदा हैं
बॅठ सोचता पथिक अनजाना इंसा खुद से कितना जुदा हैं
किसी कोण से देखो वहाँ चेहरे पर इक नया चेहरा पुता हैं
मजा तो यह इंसा हर कोण पर अपनी ही दुनिया बसाता हैं
हंसो जिसका वह खुद ही ब्रम्हा विष्नु व महेश बन जाता हैं
वही रचियता वही पालक फिर वही विनाशकर्ता कहलाता हैं
वक्त न मिले विचारने को चूंकि उसकी रची दुनिया शान हैं
नही होश में कभी रहा इंसान करता खुद बनता अनजान हैं
वाह प्रकृति तू होगी कितनी महान जब कृति तेरी महान हैं
प्रकृति न समझे तुझे लगाया आत्मा की शरण में ध्यान हैं
पथिक अनजाना
--सतनाम सिंह साहनी
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