शनिवार, 13 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६८२ -- बहुत खेद होता — पथिकअनजाना

बहुत खेद होता पाते अपने इर्द  गिर्द
झूठे आडम्बरी प्यारों का चतुर साया
प्यार जिन्हें दिया राह दिखाई बैठाया
कभी सिर पर वही रखते दुश्मनी काया
कहते मजबूर सामने हमारे हित आया
बलि दोस्त की बलिदान हमारा हें माया
गम न खोया यार सुखी हुआ घर संसार
परवाह नही कल बेच दें हमें शागिर्द हैं
झूठे आडम्बर झूठे प्यार से बनी काया
खेद इसलिये चुने काँटे अपने इर्द गिर्द
जाने क्यों ऐसा लोगों को कहते सुना हैं
आस-पास को काँटे कह खुद को गुलाब
हम न समझे क्यों नाज करते हैं जनाब
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंहसाहनी)


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