रविवार, 14 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६८३ -- लिखना वही जो पाठक की ---पथिकअनजाना

इंसान बहुत हैं पर इंसानियत बहुतेरे जानते नही
धार्मिक बहुत हैं पर धर्म परिभाषा पहचानते नही
सामाजिक बहुत हैं पर समाज उद्धेश्य मानते नही
नेता बहुत हैं पर नेतृत्व गुणों को वे अपनाते नही
अभिनेता  सभी हैं पर अभिनय सीमा बांधते नही
समुदाय बहुत पर गैरसमुदायों को सम्मान देते नही
मार्गदर्शक बहुत हैं पर अपना मार्ग वह जानते नही
वक्ता बहुत पर बहुतेरे आत्मिक आवाज सुनते नही
याद आते मुझे ब्लाग दुनिया के वे मेरे पहले दिवस
सलाह मिली लिखना वही जो पाठक की पसन्द हो
इंसानी प्रयास संचालित नही स्वचालित होते जा रहे
बांधते खुद को सब पर सत्यता में क्यों बांधते नही
नही वाह मिले हंसते तब जब सुराह किसी ने कही
पथिक  अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)


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