बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६८० -- कोई औकात नही — पथिक अनजाना

क्यों होकर इस तरह बेआबरू यार
तू इनकी पगधूल चाटता हैं दीवाने
यह क्या जाने तेरी औकात क्या हैं
जिनकी खुद की कोई औकात नही
हंसे पथिक वे औकात की करे बात
न पता आगे का चढी मानो बारात
वक्त अगर ठुकराये हो क्या ओकात
तेरे कदमों की धूल सिर इनके बैठेगी
इनकी आंतें कहें चलाओ औकात वार
शैया वारों की हुई जमीं नगरीयारों की
तू राह चल अपनी, जाने दे अंह सवार
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)


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