शनिवार, 6 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६७६ -- वर्ना हैं क्या जहाँ में --- पथिकअनजाना

कौन कहता हैं कि जहान में बहुत कुछ असंभव हैं
गर असंभव हैं तो यारों उसका निर्माण क्यों होता
कहो यहकि इसे संभव बनाने की ठानी नही तुमने
वर्ना हैं क्या जहाँ में जिसे इंसा संभव नही करता हैं
कुछ को कयानात में जिस से बचना असंभव माना
शंका इर्ष्या व अंहकार से बचना असंभव पहचाना हैं
गर इन्हें न याद करो न रखो न दिमाग में ही पालो
गर धैर्य विवेकी बनो व संभावित कर्मसजा होख्यालो
तो जीवन आसान संग हमसफरों के प्रेमगीत गालो
पथिक  अनजाना  ( सतनाम सिंह साहनी) 


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