शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६७५ -- विपरीत सोच से हजारों --- पथिक अनजाना

इस दुनिया का एक अकाटय सत्य देखा मैंने यहाँ है
जिन पति पत्नी में येनकेन प्रकारेण जहाँ वाले तो
मतभेद लाने में लोग सदैव असफल हो ही जाते हैं
उन पति-पत्नी के मध्य उनकी जन्मी हुई संतानेंही
हंसते हुये सरलता से मतभेद लाने मे सफल होतीहैं
अत: इंसान न सोच यार तू आशियाने में महफूज हैं
जिस रोज तारे देखेगा भाग्य के उड जायेंगें फ्यूज हैं
अनिश्चित सांसें अनजानीदुनिया से रहे सदा जूझ हैं
खोज सोच ग्रन्थ बोझ व्यर्थ मना मस्ती तू मौज हैं
कुछ न पायेगा रे इंसा तू बनाता स्वप्न महल रोज हैं
अगली पिछली सोच से हजारों युद्ध हुये दुखदायिक हैं
इंसान को इंसा ने न बख्शा व्यवसायिक हो खोई बुद्ध
आशांति का कारण विपरीत सोच से हुये हजारों युद्ध
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)


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