ऐ इंसान सिर अपना सुकर्म की गोद में तुम रख दो
नियंत्रण पैरों का मां धरती व आत्मा के सुपर्द करदो
शांति,धैर्य के दोनों पंखों सहारे घूमो मस्त हवाओ में
फिर पावोगे सफर जमीन का कितना सुहाना सफर हैं
दुखी बेवजह चूंकि नियंत्रक खुद के खुद बन जाते हो
भूल जाते हाथ तुम्हारे कुछ नही सब अपना बताते हो
तुम मात्र यात्री बन के क्यों नही जिन्दगी बिताते हो
करो कल्पना चालक हटा दो गर,क्या मंजिल पाते हो
पीडायें पावोगे गर नियंत्रक हटा
नियंत्रक बन जावोगे
कुविचारों, बाजारों के दलदल से उभरो सफर सजावोगे
पथिकअनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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