विगत दिनों प्राप्त जी मेल से काव्य
रचना पढने को मिली
उदगार हैं कि पत्नियाँ गुलामों की तरह रहती यहाँ घरों मैं हैं
शायद आस-पास उनके यह वातावरण हैं प्रकट हुये विचार हैं
वस्तुत:यह कि अब रहती पत्नियाँ घरों मे बादामों की तरह हैं
निगाहों की खोजी ज्योति बढाती गैरों के लिये बादाम कहलाती
पुरूष परिचय प्रतीक मूंछें त्यागते यहअंकुरित मूंछ पा जाती हैं
सामान अधिकार असमान अधिकार बनते कहानी बन जाती हैं
हावी मायके व ससुराल में बन मासूम परिवार भंजना हो जाती
पूजते जिन्हें महाभारत रामायण उनमें युद्धों की आधार शिला हें
चुनौती स्वरूप पुरूषत्व निर्बलता अपनाये, रहे यह खिली खिली
================काव्य रचना पढने को मिली-------
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
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