गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६८७ -- इंसानी बेवकूफियाँ देखिये

इंसानी बेवकूफियाँ देखिये कितनी  हास्यापद हैं
अपने कर्मों की बात को नजर अंदाज  करके वो
इच्छानुसार पथ्थरों पुस्तकों के आकार गढ  कर
विचारों को नही बूझे बल्कि गंधों कंधों से पूजते 
बिताई ध्यान रख सत्य को मान्य जो निरापद हैं
युगों से यही चल रहा बुद्धिहीनता की नही हद हैं
युद्ध कराये गये राह काव्य व नृत्य दिखाये गयेहैं
याद जरूर किये जाते उद्धेश्य नही समझ पाते हैं
बलि करोडों से भूख न मिटी नये युद्ध अजमाते हैं
प्रर्दशनियाँ कर बेवकूफियों की बुद्धिमान कहलाते
भीतरी शान सर्वोपरि सो  इंसान यहाँ  कहलाते हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)




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