ढलती उम्र का तकाजा या काव्य रचना का नशा छाता
दोनों इंसान को सुविधापूर्ण शैया पर निद्राहीन करते हैं
कब कोई तुक पकड आवे कब कोई नस बेवफा हो जावे
तब मैं आत्मा की नाव में चोरी से ब्रम्हाण्ड गांव में कर
सैर विचारों की पतवार से वायुसागर में मंथन करता हूं
पूछा था खुदा से अंह,काम, क्रोध, लोभ,मोह कैसे भगावे
हंस के बोला खुदा पथिक जानते रूप,रंग तो हमें बतावें
मैने सोचा देखा न इनको कभी कही कैसे इन्हें समझावें
जान गया उलझन मेरी भीतर तेरे बसे यह तेरी हैं प्रजा
राजा तू राज्य का तो कैसे देवे हम अंह वगैरह को सजा
बाँवरे अपनी प्रजा को तू खुद नियंत्रित कर गैर लेते मजा
हो शर्मिन्दा प्रतीज्ञाबद्ध हुआ न चलने दूंगा इनकी मैं रजा
बन गया पथिक अनजाना संसारिक फिल्म देख लू मजा
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें