शनिवार, 8 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक - ६४७ - किस नजरिये से समझ रहा हैं — पथिक अनजाना

मानता हू कि जीवन पथ की यात्रा बेहद कठिन व मायावी हैं
मगर हाथ तेरे तू दुनिया को किस नजरिये से समझ रहा हैं
माना कि दुर्गन्धी दलदल खौफनायक आवाजें तुझे खिंचती हैं
पर कमल भी वही मुस्कान-बल भी वही सुराह तुझे बताती हैं
उम्मीदों चिन्ताऔं रंगीले चरित्रों चित्रों से भरी इस दुनिया में
मिले गर साथी सहायक निस्वार्थी मुस्कराता चेहरा विचारक
हो सफर आसां खुशनुमां बढ जाती हाथ पैरों की लम्बाईयाँ हैं
यह श्रृखंला रूप लेती जब विकराल रूप पूरा पथ महक जाता
हाथ मित्रता का होता सहारा हर कदम पर हौसला छा जाता है
यार जाग थाम क्षमा बैराग व छोड तौल तब बोल तेरे कीमती
सुकर्मों की खेती पनपा तारीफ की न कर कभी यहाँ आस कीहैं
नजर,दिल व दिमाग को रख यार काबू यह माया तो छलावी हैं 
माना कि जीवन पथ-----
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग सूनी राह का पथिक http://jasmeh.blogspot.com
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें



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