शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ६४६ क्यों आसां राह हम खो रहे -- पथिक अनजाना

वह  राह जिसमें गुजरता मैं वर्षों से रहा
इक रोज देखा बना किनारे राह नया घाट
निर्माणार्थ इंसा श्रृद्धा व मेहनत से सेवारत
कुछ बैठ लग साथ बुदबुदाते न जाने हम
कोई मस्त स्थल किनारे कोई थामे गम
वहाँ  मिट्टी की ले चुटकी ताबीज बो रहे
हंसे खुद पर क्यों आसां राह हम खो रहे
वरदान मिल गया भगवान मिल गयाहमें
दुहराई माथे लगाई घर जा ताबीज बनाई
पहन झूमे हो मस्त सारी प्रकृति जीव चूमे
मिनटों में खुशियों का कारवा गुजर गया
थे हम वही साकी वही हवा नही कुछ नयी
रोने लगे मिट्टी ने  हमें यहाँ दुत्कार दिया
पूछा यार से हश्र मिट्टी तिलक से क्या हुआ
हालत एक पा, स्थल के खादिम को छुआ
बोला मैं कहाँ अलहदा सबके साथ हैं हुआ
हंसे सब,पता लगाया जमी में कौन सो रहा
नही मालुम किसी को कहानियाँ बनी अनेकों
महिमामंडित कर लोगों ने दुकान चमकाई हैं
किया किनारे सुकर्म राह धूल माथे लगाई हैं
यकीं सुकर्मों पर नही यकीन धूल ने पाई हैं
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
ब्लाग सूनी राह का पथिक http://jasmeh.blogspot.com

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें