गुरुवार, 6 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ६४५ -- संसारिक रात्रि गुजार रहे -------- पथिक अनजाना

जीवन से मरण तक रहकर के यहाँ
संसार में संसारिक रात्रि गुजार रहे
कुछ तुम्हें अनजाने खौफ से डराते
कुछ आशा के दीप क्यों जलाते हैं
दिन निश्चित मरण की घडी  के
इन्तजार में क्यों जीवन गुजारते हैं
सांसारिक रात स्वतः बीत जावेगी
सूर्योदय के इंतजार में संवर रहे हैं
न भयभीत होवो खौफौं से न किसी
आशादीप हेतू शांति व लहू जलावो
विचार तुम्हारे बाती कर्मों का तेल
हाथ तुम्हारे खुद को ले जाते कहाँ ?
कहा किसी ने कुछ जीते जिन्दगी
यहाँ आकर कुछ जीवन गुजारते हैं
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
ब्लाग सूनी राह का पथिक http://jasmeh.blogspot.com
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें


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