माना कि परिवार का हर सदस्य
कर्मों की सजा जमीं पर काट रहे हैं
धिक्कारो समाज को जिनसे कि कैदी
अच्छे वो जो सुख दुख को
बाँट रहे हैं
यह सजा उनके कर्मों की देन माना
हालातों, समाज ने मजबूर किया था
गैरों की दी मजबूरी बनी जुर्म मंजूरी
सिद्ध हुआ न दोष बोतल न शराब का
दोष इंसानी संगत व बिखरे ख्वाब का
गर दुष्प्रवृति होती न बाँटते गमों को
फिर परिवार में क्यों छांटते कर्मों को
पथिक अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें