शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ६५३ - कैसी प्यास हैं पैसा - --- पथिक अनजाना

पैसा पैसा जग में यह कैसी प्यास यारों पैसा
आस हैं पैसा, निराश है पैसा, शाबाश हैं पैसा
पैसा उठाता गिराता बुलाता रूलाता खिलाता
भगाता बहाता व मौत की नींद भी सुलाता हैं
घुमाता गैरों को पिछलग्गू भी बनाता गैरों का
बेढियों की संख्या बढाता प्यार से दूर ले जाता
सभी कानून कायदे संविधान मर्यादा रख ताक
कैद सृष्टि निर्माता को लोहे चुने सीमेंट में ये
जरूरतमंद की फिक्र न होती कभी किसी को
चाहे नही की कभी ईश्वर भक्ति मेहरबान ने
नामशिला लगा ईश्वर के ताजमहल बनाता हैं
संसार का दिखावा, झूठी शान पहचान पैसा
काया माया छाया रियाया छोड खोजे पैसा हैं
अमीर, नेतागण चाहे राज या समुदायिक हो
न देखी निस्वार्थता कभी इनमें जीवन में मैने
हास्यापद इंसा मरने के बाद तूफान लाता पैसा

पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )

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