शनिवार, 15 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक – ६५५ -- अगरबत्ती लगाने को बहुत कुछ - पथिकअनजाना

मेरे चाहने वालों  रहेगी एक ही ख्वाहिश
बाद आत्मा पंछी के उडने पर  होवे पूर्ण
एक बार मेरे  विचारों को शांति से अगर
पढ लो उसे, बात नजर में खास न होगी
रद्धी क्रेता को बेचना बहलाने दिल फुर्सत
के लम्हों,  उम्मीदों के पलों में पढ लेगा
अगरबत्ती लगाने को बहुत कुछ जहाँ में
हंसू मैं अगरबत्ती से तुम राह खोजते हो
मति में बैठाने  तुम खोजते कुछ नही हो
खासमखास हो तब मेरे विचारों के पन्ने
गर खोज कर के अपने पल्ले लिये बन्ने
बाँधा,आत्मसात किया तोश्रृद्धांजलि होगी
तुम्हें हंसता पा मायूसी कही हावी न होगी
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )

ब्लाग सूनी राह का पथिक

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