रखवारा हो जावे जब लाचार
मेंढें खेत खाने को हुई तैयार
फसल किस से करेगी पुकार
आके अब कौन उसे बचावेगा
प्रश्न रखवारों की परीक्षा.होरही
उठाते काँधे स्वार्थी हो गये हैं
विवेकखो विरोधी काँटे बो रहा
मौका न चुकने मे खो गयाहैं
वचन रक्षा का कहाँ सो गया
वचन रख ताक बटोरते धन
बन रहा इतिहास हुआ गवाह
रखवारे करते हैं अब व्यापार
अशांती की बेडियों में जकडा
मालिक देखे लुटता देशमाल
बनी गई उम्मीदों की मजार
हंसे पथिक देख देख दुनिया
रखवारों के फैले सब्जबागों.हैं
पर हो अब शान से व्यापार.हैं
पथिक अनजाना -सतनाम सिंह साहनी
यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित
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