मानव मन शांत क्यों नही बैठता जीवन में किसी पल भी
काल्पनिक राहों पर बेखौफ बेरोकटोक रहता मानव मन हैं
हास्यापद बात वह भली भांति जानता यह सैर काल्पनिक
जाने यह भली कि कुछ हासिल न होने वाला इंसा को हैं
फिर भी माया के विभिन्न रूपों से टकराता व खोया रहता
कैसा गुरूत्वाकर्षण जो कि इंसा पर नशा हावी हो जाता हैं
इंसा के वश में नही सांसों के आकर्षण में जीवन गुजारता
जखीरा सांसों का जब खत्म होता तब हाथ मलता रहता हैं
तब हीसमझता व्यर्थ जखीरा लुटाया न खुदा पाया न माया
पथिक अनजाना (
सतनाम सिंह साहनी)
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