गुरुवार, 27 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६६७ - विवादों की सीढियाँ — पथिक अनजाना

पंक्ति से हटकर जब कोई अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हैं
प्रथम प्रभाव दर्शक पर होता तब जब नया कुछ कर पाता
आकर्षित होती दुनिया चाहे सही या गलत प्रभाव जमाता
करने मजमा इकठ्ठा ज्यों मदारी विवश बंदर को नचाता हें
चन्द कदम चल साथ सचेत पथिक हमराही को जान पाता
दस्तक वास्तविकता की सुन विचार कसौटी पर लाया जाता
राम,रावण में श्रेष्ठ कौन नजरिया दर्शक का क्यों हो जाता
विचार,व्यक्तित्व,आकलन,जीव, हरकत विशिष्ट बनाती हैं
पंक्ति से हटे पथिक अनजाना की यादें जगह बना जाती हैं
छलबल विलम्ब, पर आकलन,विकलन,समाकलन बताती
खुश न हो सब, जनता तो विवादों की सीढियाँ चढ जाती हैं
पथिक अनजाना(सतनाम सिंह साहनी)


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