रविवार, 23 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६६३ -- नया पाठय-क्रम — पथिकअनजाना

विगत दिनों अपनी जब किसी लघु-यात्रा के दौरान
आग्रह पर किसी के निवास स्थान पर बने मेहमान
स्वागत शानदार चला फिर विचार विमर्श व्यवहार
भारतीय परिवारों की तरह काकटेल विचार के विषय
बात आई मौसम पर सदस्य ने कोई इच्छा जताई
परिवार प्रमुख ने मौसम विरूद्ध वह इच्छा थी दर्शाई
बरसात हो रही थी बहू ने बच्ची को अंगुली थमाई
बिना बताये किसी को बाहर जाने की बात बनआई
वापिसी पर मौसम विरूद्ध कहा जिसे वह घर लाई
मैं हैरा रात्रि हेतू निर्देशित शयनकक्ष में जा विराजा
सुना बाहर पिता ने पुत्र के सामने आपत्ति पेश की
पुत्र ने पक्ष ले दी सलाह आप सलाह न दिया करो
सुना राजनीति में अपराधी सिद्ध न्यायाधीश पदोन्नत
न्यायालय में आत्मा व परमात्मा को बना के साक्षी
चिकित्सालय में रोगी के परिजनों से लेके अभयदान
चिकित्सक को अपनी योग्यता पर, गवाहों को जब
अपनी जुबां पर यकीन नही तो प्यादे मनमर्जी करेंगें
संसद में दर्शा संवैधानिक निष्ठा जब होते गलत कार्य
अत: पिताश्री गांठ बांधें नया पाठयक्रम जो छा गया हैं
देखें बुरा सुनें बुरा, न खोले अनुभवों विचारों का पिटारा
किसी ने कहा जो हो रहा होने दें तो दोष नही तुम्हारा
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )





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