शनिवार, 22 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६६२ -- मंजिलें उनकी होती ----- पथिक अनजाना

रे पथिक तू पथिक से कैसे पथिक अनजाना बन गया
राह अपनी से गुजर रहा था  जगत में क्यों रम गया
भटका संसारिक गलियों में कैसी तू राह खोज रहा था
राह,चाह,वाह एवं अथाह में भ्रमाया हाथ कुछ न आया
मंजिलें उनकी होती यारों जो कहीं रूक जाना चाहते हैं
फैसला तेरा  तू पथिक रहेगा या  वृतिक रह बौरायेगा
वृतिक  वृत सीमा पर चल न बाहर न भीतर से पाता
पथिक अनजानी राह काँटों व खाईयों से राह बनाता हैं
बेफिक्र हो गुजर राह से सर झुकायेंगी अनेकों मंजिलें
राह  ही नही भविष्य सलाम करेगा तू राही बन गया
मत जोड खुद को राह की मस्तियों बस्तियों से कभी
इतिहास याद करे जबसे तू पथिक अनजाना बन गया
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )
ब्लाग सूनी राह का पथिक



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