शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ६६१ -- जब तक वे अपने है --- पथिक अनजाना

अपने तो अपने ही हैं यारों ध्यान रहे जब तक वे अपने है
प्यार उनकी आंखों में बसे दिलों में हमारे हितार्थ सपने हैं
अपने विषैले तब होते  जब स्वार्थ के रोग से ग्रस्त होते हैं
जब चालें बसे आंखों में दिलों में उनके हितार्थ सपने होते
लाजवाब बीमारी विवेक छीनती कीमत लगा रिश्ते खोते हैं
यार मजबूरियाँ व मशहूरियाँ को मजार बना सुखी सोते हैं

पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी )

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