शनिवार, 1 नवंबर 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक – ६४० - जिन्दगी की चाह ------ पथिक अनजाना

संसारिक रूढिवादिता के दायरे लगते जाल हैं                      
यारों की आबाद महफिलें मुझे लगे दीवाल हैं
चाहत हैं न अंध-मूक-बधिर बन जीवन जियें
गम नही संसारिक परिवर्तन न कर सके जीते
खुशी इसकी किसी परिवर्तन के सूत्राधार बने
गम तो तब हो जब विदा जहाँ से रीतेअनबने
किस काम की ऐसी बुद्धिमता  गलत स्वीकारें
जिन्दगी किस नाम की जो चुप जीवन गुजारे
कर न सके तो क्या राह परिवर्तन की दिखादी
चले न  तो क्या चाह अपने  मन की बता दी
न चले कोई राह हमारी पर निशां रह जायेंगें
न फले चाह हमारी पर पथिक तो कहलायेंगें
बेमिसाल दोस्त विशाल राह जुदा तो ख्याल हैं
----------------दायरे लगते जाल हैं
पथिक   अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)
ब्लाग – सूनी राह का पथिक

यदि उदगार को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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